वन पर्व  अध्याय २१

वासुदेव उवाच

ते हय़ान्मे रथं चैव तदा दारुकमेव च |  २२   क
छादय़ामासुरसुरा वाणैर्मर्मविभेदिभिः ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति