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वन पर्व
अध्याय २१
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वासुदेव उवाच
ततोऽहमपि कौरव्य शराणामय़ुतान्वहून् |  २४   क
अभिमन्त्रितानां धनुषा दिव्येन विधिनाक्षिपम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति