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वन पर्व
अध्याय २१
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वासुदेव उवाच
मत्कार्मुकविनिर्मुक्ता दानवानां महारणे |  २७   क
अङ्गेषु रुधिराक्तास्ते विविशुः शलभा इव ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति