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वन पर्व
अध्याय २१
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वासुदेव उवाच
अनभिज्ञेय़रूपाणि द्वारकोपवनानि च |  ३   क
दृष्ट्वा शङ्कोपपन्नोऽहमपृच्छं हृदिकात्मजम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति