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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
ततः शल्यो महाराज धर्मराजं युधिष्ठिरम् |  ४७   क
विव्याध निशितैर्वाणैर्हन्तुकामो महारथम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति