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वन पर्व
अध्याय २१
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वासुदेव उवाच
ततो नाज्ञाय़त तदा दिवारात्रं तथा दिशः |  ३७   क
ततोऽहं मोहमापन्नः प्रज्ञास्त्रं समय़ोजय़म् |  ३७   ख
ततस्तदस्त्रमस्त्रेण विधूतं शरतूलवत् ||  ३७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति