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वन पर्व
अध्याय २१
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वासुदेव उवाच
एवमुक्तस्तु स मय़ा विस्तरेणेदमव्रवीत् |  ५   क
रोधं मोक्षं च शाल्वेन हार्दिक्यो राजसत्तम ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति