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द्रोण पर्व
अध्याय ८६
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सञ्जय़ उवाच
जानीषे हि रणे द्रोणं रभसं श्रेष्ठसंमतम् |  १३   क
प्रतिज्ञा चापि ते नित्यं श्रुता द्रोणस्य माधव ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति