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वन पर्व
अध्याय २१
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वासुदेव उवाच
नाहत्वा तं निवर्तिष्ये पुरीं द्वारवतीं प्रति |  ९   क
सशाल्वं सौभनगरं हत्वा द्रष्टास्मि वः पुनः |  ९   ख
त्रिसामा हन्यतामेषा दुन्दुभिः शत्रुभीषणी ||  ९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति