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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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राजो उवाच
यत्तद्वर्षशतं पूर्णं जप्यं वै जपता त्वय़ा |  ४७   क
फलं प्राप्तं तत्प्रय़च्छ मम दित्सुर्भवान्यदि ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति