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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
कीचकोऽथ गृहं गत्वा भृशं हर्षपरिप्लुतः |  १९   क
सैरन्ध्रीरूपिणं मूढो मृत्युं तं नाववुद्धवान् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति