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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
उपसङ्गम्य चैवैनं कीचकः काममोहितः |  ४३   क
हर्षोन्मथितचित्तात्मा स्मय़मानोऽभ्यभाषत ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति