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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रापितं ते मय़ा वित्तं वहुरूपमनन्तकम् |  ४४   क
तत्सर्वं त्वां समुद्दिश्य सहसा समुपागतः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति