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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
नाकस्मान्मां प्रशंसन्ति सदा गृहगताः स्त्रिय़ः |  ४५   क
सुवासा दर्शनीय़श्च नान्योऽस्ति त्वादृशः पुमान् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति