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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
स केशेषु परामृष्टो वलेन वलिनां वरः |  ४८   क
आक्षिप्य केशान्वेगेन वाह्वोर्जग्राह पाण्डवम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति