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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तद्भवनश्रेष्ठं प्राकम्पत मुहुर्मुहुः |  ५३   क
वलवच्चापि सङ्क्रुद्धावन्योन्यं तावगर्जताम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति