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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
उवाच च महातेजा द्रौपदीं पाण्डुनन्दनः |  ६१   क
पश्यैनमेहि पाञ्चालि कामुकोऽय़ं यथा कृतः ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति