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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
कीचकं घातय़ित्वा तु द्रौपदी योषितां वरा |  ६३   क
प्रहृष्टा गतसन्तापा सभापालानुवाच ह ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति