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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्या नर्तनागाररक्षिणः |  ६५   क
सहसैव समाजग्मुरादाय़ोल्काः सहस्रशः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति