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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
क्वास्य ग्रीवा क्व चरणौ क्व पाणी क्व शिरस्तथा |  ६७   क
इति स्म तं परीक्षन्ते गन्धर्वेण हतं तदा ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति