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भीष्म पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
एवं राजन्विजानीहि ध्रुवोऽस्माकं रणे जय़ः |  १२   क
यथा मे नारदः प्राह यतः कृष्णस्ततो जय़ः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति