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भीष्म पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
तस्य ते न व्यथां काञ्चिदिह पश्यामि भारत |  १७   क
यस्य ते जय़माशास्ते विश्वभुक्त्रिदशेश्वरः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति