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शल्य पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
तत्र योधा महाराज विचरन्तो ह्यभीतवत् |  २४   क
दृश्यन्ते रुधिराक्ताङ्गाः पुष्पिता इव किंशुकाः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति