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द्रोण पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
पिता सुतं त्यजति सुहृद्वरं सुहृ; त्तथैव पुत्रः पितरं शरातुरः |  ४१   क
स्वरक्षणे कृतमतय़स्तदा जना; स्त्यजन्ति वाहानपि पार्थपीडिताः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति