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कर्ण पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
द्विरदरथनराश्वशङ्खशव्दैः; परिहृषिता विविधैश्च शस्त्रपातैः |  २   क
द्विरदरथपदातिसार्थवाहाः; परिपतिताभिमुखाः प्रजह्रिरे ते ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति