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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
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वासुदेव उवाच
इत्युक्तवचने कृष्णे भृशं क्रोधसमन्वितः |  १९   क
उत्तङ्कः प्रत्युवाचैनं रोषादुत्फाल्य लोचने ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति