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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
यच्च काष्ठं तृणं चापि शुष्कं चार्द्रं च भारत |  ५९   क
सर्वं तद्भस्मसाद्भूतं दृश्यते भरतर्षभ ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति