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कर्ण पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
परिघमुसलशक्तितोमरै; र्नखरभुशुण्डिगदाशतैर्द्रुताः |  ५   क
द्विरदनरहय़ाः सहस्रशो; रुधिरनदीप्रवहास्तदाभवन् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति