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शल्य पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
तदपास्य धनुश्छिन्नं माद्रीपुत्रः प्रतापवान् |  ११   क
अभ्यधावत राजानं प्रगृह्यान्यन्महद्धनुः |  ११   ख
ततो दुर्योधनं सङ्ख्ये विव्याध दशभिः शरैः ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति