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शान्ति पर्व
अध्याय ९४
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वामदेव उवाच
नाकाले प्रणय़ेदर्थान्नाप्रिय़े जातु सञ्ज्वरेत् |  ३४   क
प्रिय़े नातिभृशं हृष्येद्युज्येतारोग्यकर्मणि ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति