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शल्य पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
समासाद्य रणे ते तु राजानमपराजितम् |  १८   क
प्रत्युद्ययुर्महेष्वासाः पाण्डवानातताय़िनः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति