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वन पर्व
अध्याय १०४
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लोमश उवाच
षष्टिः पुत्रसहस्राणि शूराः समरदर्पिताः |  १४   क
एकस्यां सम्भविष्यन्ति पत्न्यां तव नरोत्तम ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति