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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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व्राह्मण उवाच
यदि राजन्प्रसन्नस्त्वं मम चेच्छसि चेद्धितम् |  ४१   क
भवतः शीलमिच्छामि प्राप्तुमेष वरो मम ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति