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शल्य पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनो धनुश्छित्त्वा धृष्टद्युम्नस्य संय़ुगे |  २९   क
अथैनं छिन्नधन्वानं विव्याध निशितैः शरैः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति