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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवाश्च महात्मानः प्रणम्य धनदं प्रभुम् |  ३३   क
नकुलः सहदेवश्च धर्मपुत्रश्च धर्मवित् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति