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शल्य पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
तय़ोर्युद्धं महच्चासीत्सङ्ग्रामे भरतर्षभ |  ३१   क
प्रभिन्नय़ोर्यथा सक्तं मत्तय़ोर्वरहस्तिनोः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति