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शल्य पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
गौतमस्तु रणे क्रुद्धो द्रौपदेय़ान्महावलान् |  ३२   क
विव्याध वहुभिः शूरः शरैः संनतपर्वभिः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति