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शल्य पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
यं यं हि समरे योधं प्रपश्यामि विशां पते |  ४   क
स स वाणैश्चितोऽभूद्वै पुत्रेण तव भारत ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति