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शल्य पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
रथनेमिसमुद्भूतं निःश्वासैश्चापि दन्तिनाम् |  ४०   क
रजः सन्ध्याभ्रकपिलं दिवाकरपथं यय़ौ ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति