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शल्य पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
रजसा तेन सम्पृक्ते भास्करे निष्प्रभीकृते |  ४१   क
सञ्छादिताभवद्भूमिस्ते च शूरा महारथाः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति