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आदि पर्व
अध्याय २१०
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वैशम्पाय़न उवाच
स कृत्वावश्यकार्याणि वार्ष्णेय़ेनाभिनन्दितः |  १५   क
रथेन काञ्चनाङ्गेन द्वारकामभिजग्मिवान् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति