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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
न स वेद परं धर्मं यो न वेद चतुष्टय़म् |  १   क
व्यक्ताव्यक्ते च यत्तत्त्वं सम्प्राप्तं परमर्षिणा ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति