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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
उष्णीषवान्यथा वस्त्रैस्त्रिभिर्भवति संवृतः |  १२   क
संवृतोऽय़ं तथा देही सत्त्वराजसतामसैः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति