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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
श्रिय़ं दिव्यामभिप्रेप्सुर्व्रह्म वाङ्मनसा शुचिः |  १४   क
शारीरैर्निय़मैरुग्रैश्चरेन्निष्कल्मषं तपः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति