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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
त्रैलोक्यं तपसा व्याप्तमन्तर्भूतेन भास्वता |  १५   क
सूर्यश्च चन्द्रमाश्चैव भासतस्तपसा दिवि ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति