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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
प्रतापस्तपसो ज्ञानं लोके संशव्दितं तपः |  १६   क
रजस्तमोघ्नं यत्कर्म तपसस्तत्स्वलक्षणम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति