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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
व्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते |  १७   क
वाङ्मनोनिय़मः साम्यं मानसं तप उच्यते ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति