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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
मर्त्यलोकाद्विमुच्यन्ते विद्यासंय़ुक्तमानसाः |  २८   क
व्रह्मभूता विरजसस्ततो यान्ति परां गतिम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति