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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
भगवन्तमजं दिव्यं विष्णुमव्यक्तसञ्ज्ञितम् |  ३०   क
भावेन यान्ति शुद्धा ये ज्ञानतृप्ता निराशिषः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति