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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
ज्ञात्वात्मस्थं हरिं चैव निवर्तन्ते न तेऽव्ययाः |  ३१   क
प्राप्य तत्परमं स्थानं मोदन्तेऽक्षरमव्ययम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति