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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
विसतन्तुर्यथैवाय़मन्तःस्थः सर्वतो विसे |  ३३   क
तृष्णातन्तुरनाद्यन्तस्तथा देहगतः सदा ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति